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उप्र लोक सेवा आयोग की 32 हजार पदों पर हुई सीधी भर्तियां सीबीआई जांच के दायरे में

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में भर्तियों के भ्रष्टाचार को लेकर प्राथमिकी दर्ज होने के बाद जहां तत्कालीन अध्यक्ष अनिल यादव के लिए खतरे की घंटी बज गई हैै, वहीं उनके कार्यकाल के कई अधिकारियों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। फिलहाल सीबीआइ ने पीसीएस-2015 की परीक्षा में ही तमाम गड़बडिय़ों के साक्ष्य हासिल किए हैं लेकिन, सीधी भर्ती की परीक्षाओं की जांच में भी तमाम अनियमितताएं सामने आएंगी। अनिल यादव के कार्यकाल में सीधी भर्ती के 278 पद विज्ञापित हुए थे, जिनके जरिये 32 हजार से अधिक पद भरे गए हैं।

लोक सेवा आयोग के सबसे विवादास्पद अध्यक्ष रहे अनिल यादव के लिए उनके ही बनाए नियम अब मुसीबत का कारण बन सकते हैं। सीबीआइ की जांच अब जिस दिशा में बढ़ेगी इसमें उनकी संपत्तियां पर तो ध्यान केंद्रित होगा हो, उनकी खुद की नियुक्ति की भी छानबीन होनी तय है। गौरतलब है कि अनिल यादव की नियुक्ति को हाईकोर्ट अवैध ठहरा चुका है। कोर्ट ने उनके चयन में तमाम अनियमितताएं पाई थीं। इसकी जांच में उस समय से कई पुलिस अधिकारी भी लपेटे में आ सकते हैैं जिन्होंने आपराधिक मुकदमा दर्ज होने के बाद भी अनिल यादव को क्लीन चिट दी थी।

इसी कड़ी में लोक सेवा आयोग के सचिव पद पर नियुक्ति न किए जाने का मामला है। अनिल यादव के कार्यकाल में लंबे समय तक सचिव पद पर कार्यवाहक के रूप में रिजवानुर्रहमान से काम लिया जाता रहा। सीबीआइ जांच में वह भी लपेटे में आएंगे। इसके अलावा अध्यक्ष ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए कई प्रस्ताव पारित कराए थे जिनमें सफल प्रतियोगियों की जाति न लिखा जाना जैसे विवादास्पद मामले भी थे।

सीबीआइ की जांच में अब तक सभी अधिकारियों ने नियमों के तहत ही काम किए जाने की बात कही है लेकिन, जांच आगे बढ़ते ही उनके लिए यह जवाब देना मुश्किल होगा कि आखिर किन परिस्थितियों में मुख्य परीक्षा की कापियां जला दी गईं। प्रतियोगी छात्र समिति के मीडिया प्रभारी अवनीश पांडेय के अनुसार आयोग ने सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारियों पर जवाब न देने का प्रस्ताव भी पारित किया था। अब जांच दायरे में आयोग का यह फैसला भी होगा कि इसकी आड़ में क्या-क्या छिपाया गया।